ये हम जो ज़िंदगी की राह पर दिन-रात चलते हैं
ये हम जो ज़िंदगी की राह पर दिन-रात चलते हैं
कहीं भी तो नहीं जाते, महज़ रस्ते बदलते हैं
हम अक्सर सोचते हैं - “ज़िंदगी का हश्र क्या होगा?”
कि जब भी पीछे मुड़ के देखते हैं, हाथ मलते हैं
यहां, सबको निज़ाम-ओ-हमसफ़र, दोनो ही बनना है
यहाँ लोगों में दोनों, आदम-ओ-शैतान बसते हैं
ज़माने भर से मिलना या बिछड़ना तो दिखावा है
हम अपने आप में रहते हैं, अपने साथ चलते हैं
ये दुनियां है, यहां सबकी कहानी एक जैसी है
मुकद्दर टूटते हैं, हाथ के नक्शे बदलते हैं
हज़ारों राज दब जाते हैं दो ख़मोश होठों में
जो किस्से अनकहे होते हैं, आंखो में पिघलते हैं