हर किसी के जेहन में चलता है कुछ, होता है कुछ

हर किसी के जेहन में चलता है कुछ, होता है कुछ
इसपे क्या गम हो कि वो कहता है कुछ, होता है कुछ

इस जहां में सबका अपना दीन, अपना है खुदा
जो किताब-ए-पाक में रहता है कुछ, होता है कुछ

वो कोई गुमनाम है किसको पता उसका हुनर
बस पता इतना है वो करता है कुछ, होता है कुछ

यूं न पूछो - अश्क-ए-ग़म बारिश है क्या? दरिया है क्या?
महज़ इतना जान लो बहता है कुछ, होता है कुछ

असल में कुछ भी नहीं होता हमारे दरमियाँ
बस मुसलसल भरम-सा लगता है कुछ, होता है कुछ

देख! तू मुझको अब इतना भी मुकद्दस मत समझ
आदमी इस खाल में दिखता है कुछ, होता है कुछ

कुछ नहीं करता है इन्साँ आदमीयत के लिए
सिर्फ़ लालच के लिए करता है कुछ, होता है कुछ

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Ravi Prakash Tripathi
Research Associate

A Ph.D. fellow working on “Security in Socio-industrial Metaverse” who could often be found somewhere messing up with bugs & vulnerabilities, contributing to open source or writing poems.

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