भला कब अपनी मर्ज़ी से कोई शैतान बनता है
भला कब अपनी मर्ज़ी से कोई शैतान बनता है,
कि जब वो चाहता है तब कोई इंसान बनता है।
असल में हम वो मोहरे हैं जो ख़ुद कुछ कर नहीं सकते,
क़ज़ा भी वो बनाता है, जो हममें जान भरता है।
भला उसको हमेशा मशवरे देकर भी क्या हासिल,
जो सब कुछ जानकर बेइंतिहा अनजान बनता है।
हर इक मातम में थोड़े शोर का होना ज़रूरी है,
हर इक जलसे में भी थोड़ा-बहुत सुनसान बनता है।
बस उसके हाथ से मिट्टी बिखर जाती है दुनिया में,
कहीं बस्ती पनपती है, कहीं वीरान बनता है।
उसी की चीज़ पाकर आदमी इतराता फिरता है,
बनता वो है… और मालिक यहाँ इंसान बनता है।