बहुत लंबे बहुत देरीना और सुनसान से रस्ते

बहुत लंबे बहुत देरीना और सुनसान से रस्ते
न जाने मुझको क्यूं रास आ गए अनजान से रस्ते

सफ़र जैसे कि मेरे दिल में दफनाई हुई गजलें
उन्ही बेजान ग़ज़लों के लिए उनवान से रास्ते

इन्होंने कर दिया है दर-ब-दर कितने ही लोगों को
अभी जो लग रहे हैं आपको आसान से रस्ते

मेरी मानो तो इन रस्तों पे रुकना सोचना भी मत
कि अक्सर घर से लगने लगते हैं वीरान से रस्ते

‘रवि’ ये ज़िंदगी के ही सफर में ऐन मुमकिन है
हमें पानी से लगने लगते हैं चट्टान से रस्ते

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Ravi Prakash Tripathi
Research Associate

A Ph.D. fellow working on “Security in Socio-industrial Metaverse” who could often be found somewhere messing up with bugs & vulnerabilities, contributing to open source or writing poems.

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