ऐन मुकम्मल होते-होते ख़्वाब बिखरता जाता है
ऐन मुकम्मल होते-होते ख़्वाब बिखरता जाता है
जब ऐसा होता है तो बस वक़्त ठहरता जाता है
मैं ख़ुद में कितना हूँ, मुझसे बातें कर तो पाएगा
हरदम तेरे भीतर कोई और उतरता जाता है
इस दुनिया की हर रौनक़ कुछ दक्कन की चट्टानें हैं
जिनमें गिरकर ये ज़ेहन-ए-बेजान फिसलता जाता है
पहले ग़म मिलते हैं, उसके बाद ख़ुशी दी जाती है
यानी ठोकर खाने वाला शख़्स सँभलता जाता है
मिलते-जुलते रहना भी बस इक हद तक ही मुमकिन है
हौले-हौले हर मस्ती का रंग उतरता जाता है
सबसे पहले मुझको छोड़ो, फिर मेरी हर यादों को
तुम देखोगे कितना जल्दी वक़्त गुज़रता जाता है
“ये जो दुनिया वाले हैं, इनकी हर बातें सच्ची हैं।”
ऐसा लगने लगता है, इंसान बदलता जाता है