अगर हम फ़र्क-ए-काफ़िर-ओ-ख़ुदा पहचानते होते

अगर हम फ़र्क-ए-काफ़िर-ओ-ख़ुदा पहचानते होते
तो मुमकिन है कि इंसानों को बेहतर मानते होते

जिन्होंने भी यहां कुछ जाना है वो सिर्फ़ इतना है
कि हम कुछ और थोड़ा इस जहां को जानते होते

अगर हम होते वाक़िफ दो जहां की नक्शकारी से
तो बेशक नक्शकारी का हुनर पहचानते होते

जो हम तूफान, सैलाब-ओ-ख़मोशी को समझ पाते
हवा, सहरा, समंदर, आसमां इंसान के होते

नज़र उसपर जो आ जाए तो बामुश्किल उतरती है
ये आदत छूटती, तो हम भी कोई काम के होते

ये सारे लोग पागल हैं जिन्हें हम अपने लगते हैं
हम इनको मानते होते, तो इनको मानते होते

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Ravi Prakash Tripathi
Research Associate

A Ph.D. fellow working on “Security in Socio-industrial Metaverse” who could often be found somewhere messing up with bugs & vulnerabilities, contributing to open source or writing poems.

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